बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को आज (30 मार्च) राष्ट्रपति भवन में भारत रत्न से सम्मानित किया गया. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उनके पुत्र सह जदयू सांसद रामनाथ ठाकुर को भारत रत्न सौपा. इस मौके पर राष्ट्रपति ने कर्पूरी ठाकुर के अलावा पूर्व पीएम चौधरी चरण सिंह, नरसिम्हा राव, डॉ. एमएस स्वामीनाथन को भारत रत्न से नवाजा. कर्पूरी ठाकुर बिहार के दो बार मुख्यमंत्री की पद पर रहे. लोग उनकी सादगी को काफी पसंद करते थे. कर्पूरी ठाकुर की सादगी और समर्पण ही उनको अन्य नेताओं से अलग बनाता था. तो जानते हैं कर्पूरी ठाकुर के बारे में…
कर्पूरी ठाकुर से जुड़ी अहम बातें
24 जनवरी 1924 को समस्तीपुर के पितोझिया गांव में कर्पूरी ठाकुर का जन्म हुआ था. उन्होंने देश की राजनीति में अमिट छाप छोड़ी है. बिहार में सामाजिक न्याय की लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने में कर्पूरी ठाकुर की अहम भूमिका रही. कर्पूरी ठाकुर के पिता का नाम गोकुल ठाकुर और माता का नाम रामदुलारी देवी था. इनके पिता एक किसान थे और बाल काटने का भी काम करते थे. कर्पूरी ठाकुर ने वर्ष 1940 में मैट्रिक की परीक्षा पटना विश्वविद्यालय से पास की और द्वितीय श्रेणी से उत्तीर्ण हुए. 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भी कर्पूरी ठाकुर ने भाग लिया. आंदोलन के दौरान 26 महीने तक वे भागलपुर के कैंप जेल में रहकर यातनाएं सही. 1945 में उन्हें रिहा कर दिया गया. 1948 में आचार्य नरेंद्र देव और जयप्रकाश नारायण की पार्टी समाजवादी दल से मंत्री बने.
1970 में कर्पूरी ठाकुर बिहार का मुख्यमंत्री बने. 1973 से 77 तक वह लोकनायक जयप्रकाश के छात्र आंदोलन में शामिल हुए. 1977 में समस्तीपुर संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से वे सांसद बने. इसी वर्ष 24 जून को वे दोबारा मुख्यमंत्री बने. कर्पूरी ठाकुर की खास बात ये है कि वे कभी भी विधानसभा चुनाव नहीं हारे.
डॉ. राम मनोहर लोहिया को कर्पूरी ठाकुर राजनीतिक गुरु मानते थे. वे हमेशा से दलित और वंचित लोगों के कल्यान के लिए प्रयत्नशील रहते थे. कर्पूरी ठाकुर सादगी, सरल स्वभाव और स्पष्ट विचार के लिए जाने जाते थे. कर्पूरी ठाकुर का एक नारा काफी प्रचलित है जो, ‘100 में 90 शोषित हैं. शोषितों ने ललकारा है, धन धरती और राज पाठ में 90 भाग हमारा है.’ आज भी इस नारे को राजनीति दल खूब इस्तेमाल करते हैं.
कर्पूरी ठाकुर ने सबसे पहले बिहार में पिछड़े वर्ग के लोगों को आरक्षण दिलाया. 1977 में पिछड़ों के लिए आरक्षण की व्यवस्था लागू हुई. 1967 में जब वह पहली बार बिहार के उपमुख्यमंत्री बने, तब उन्होंने बिहार में मैट्रिक परीक्षा पास करने के लिए अंग्रेजी विषय की अनिवार्यता को खत्म कर दिया था. जननायक कर्पूरी ठाकुर की ईमानदारी की चर्चा आज भी होती है. 17 फरवरी 1988 को कर्पूरी ठाकुर बीमार पड़े और उन्हें इलाज के लिए पटना के पीएमसीएच ले जाने के दौरान उनकी मौत हो गई. 64 वर्ष की उम्र में उन्होंने अंतिस सांस ली. आज उनके निधन के 36 वर्ष बाद केंद्र सरकार की ओर से भारत रत्न से सम्मानि किया गया.